अक्सर आपने देखा होगा कि जब लोग किसी बहती नदी या नहर के पास से गुजरते हैं, तो वे अपनी जेब से एक, दो, पांच या दस रुपये के सिक्के निकालकर पानी में फेंक देते हैं। यह दृश्य आम है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों किया जाता है? क्या यह केवल एक परंपरा है, अंधविश्वास है या इसके पीछे कोई गहरी धार्मिक और वैज्ञानिक मान्यता छुपी हुई है? आइए इस प्राचीन परंपरा को विस्तार से समझते हैं।
धार्मिक मान्यता: मां लक्ष्मी की कृपा पाने का उपाय
धार्मिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक पौराणिक परंपरा है। कहा जाता है कि नदी को मां के समान माना गया है और मां के दर्शन होने पर उन्हें कोई भेंट अर्पित करना शुभ माना जाता है। बहती नदी में सिक्का डालने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। यह परंपरा लोगों की आस्था और श्रद्धा से जुड़ी हुई है।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण: सूर्य की स्थिति होती है मजबूत
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब कोई व्यक्ति बहती नदी में सिक्का डालता है तो इससे उसके जन्म कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत होती है। सूर्य को ग्रहों का राजा माना गया है और इनकी स्थिति सशक्त होने से आत्मविश्वास, ऊर्जा और स्वास्थ्य में सुधार आता है। मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों को भी इससे राहत मिलने की बात कही जाती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: पानी की सफाई में मददगार
विज्ञान के अनुसार, इस परंपरा की जड़ें प्राचीन भारत से जुड़ी हुई हैं। उस समय जो सिक्के प्रचलन में थे, वे तांबे के हुआ करते थे। तांबा एक ऐसा धातु है जो पानी में जाकर उसमें मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और विषाणुओं को खत्म करने की क्षमता रखता है। इससे पानी कुछ हद तक शुद्ध होता है। इसीलिए पुराने समय में बहती नदियों में तांबे के सिक्के डालना एक उपयोगी परंपरा मानी जाती थी।
आज की स्थिति: परंपरा बन चुकी आदत
हालांकि अब तांबे की जगह स्टील और अन्य धातुओं के सिक्के चलन में हैं, जिनमें वह शुद्धिकारी गुण नहीं होते। लेकिन यह परंपरा अब लोगों की आदत और श्रद्धा का हिस्सा बन चुकी है। चाहे धार्मिक आस्था हो या वैज्ञानिक सोच, यह परंपरा भारतीय संस्कृति में गहराई से रच-बस गई है।
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